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होली की पूर्व संध्या पर होलिका जलाई जाती है, जो बुराई पर अच्छाई के विजय की प्रतीक है। होलिका दहन की कथा में गहन प्रतीक है। होलिका अज्ञान व अहंकार को निरूपित करती है, जबकि प्रह्लाद ईश्वर के प्रति निष्ठा व निश्छलता को। होली पर सम्पन्न किया जाने वाला होलिका यज्ञ दशहरा के रावण दहन से सर्वथा भिन्न है, क्योंकि होलिका की अग्नि मनुष्य के ‘जीवन यज्ञ’ का प्रतिनिधित्व करती है।

शास्त्र में वर्णित है कि यज्ञ के कारण ही ब्रह्मा जी ने इस जगत की रचना की और मनुष्य मात्र को यह उपदेश दिया कि यज्ञ के द्वारा ही संसार में देवताओं की कृपा पाई जा सकती है। स्पष्ट है कि बिना अग्नि के यज्ञ की कल्पना नहीं की जा सकती है। ऐसे में आश्चर्य की बात नहीं कि ऋग्वेद का प्रथम मंत्र अग्नि को समर्पित है, क्योंकि अग्निदेव देवदूत की तरह मनुष्यों द्वारा दी गई हवि को देवताओं तक पहुंचाते हैं।

वास्तव में, देवता हमारे मित्र हैं और उनके प्रति वेद का सिद्धांत है- ‘देहि मे, ददामि ते’ अर्थात तुम मुझे दो, मैं तुम्हें देता हूं’, जो कालांतर में ‘त्वदीयं वस्तु गोविन्द तुभ्यमेव समर्पयेत’ में परिवर्तित हो गया। उपनिषद में स्पष्ट लिखा है कि इस जगत में जितने भी पावन कार्य हो रहे हैं, वे सभी यज्ञ हैं। इसलिए अपने जीवन को प्रगति की ओर ले जाना कर्म यज्ञ है और होलिका की अग्नि इस कर्म यज्ञ को सात्विकता की ओर मोड़ने का स्मरण दिलाती है, क्योंकि होलिका का अंत प्रह्लाद के प्रति उसके द्वेष का परिणाम था।

होलिका की अग्नि में डाली गई समिधा यज्ञ के तीनों लक्षण- ‘द्रव्य, देवता और त्याग’ से ओतप्रोत है। भक्ति भाव से प्रेरित होकर होलिका की अग्नि में देवता को समर्पित किया गया हविष्य अन्न देवता की प्रसन्नता का कारण बनता है। होलिका की अग्नि में हम मन के भीतर छाए अहंकार, अज्ञान व दुष्कर्म का त्याग कर, उसे होम कर, सत्कर्मों का रक्षा कवच पहन कर प्रह्लाद की ही भांति निरापद बाहर आ कर रंगोत्सव का आनंद ले सकते हैं।

नंदकिशोर श्रीमाली

इस जीवन यज्ञ में कर्म हमारे द्वारा दी जा रही आहुति है, किंतु जब तक हम अपने जीवन में सारे रंग नहीं भरेंगे, तब तक इस जीवन में आनंद को अनुभव नहीं किया जा सकता है। जैसे अग्नि समापन का प्रतीक है, वैसे ही अगले दिन खेला गया रंगोत्सव सृजन का परिचायक है।