रेट खुलने का इंतजार कर राह देख रहे हैं ज्यादातर जीते हुए जिला पंचायत सदस्य, जल्द होगा खुलासा

चंदौली जिले में जिला पंचायत अध्यक्ष का चुनाव पैसे का खेल ही बनता जा रहा है, जो भी इस कुर्सी पर काबिज होना चाहता है। वह पैसे के ही दम पर आसाना से यह कुर्सी पा सकता है। ऐसी चर्चा फिलहाल तेज है कि अबकी बार जिला पंचायत का समीकरण कुछ ऐसा है कि अबकी बार सबसे अधिक व मुंहमांगी कीमत मिलने जा रही है।

बताया जा रहा है कि जब से चंदौली जिले का गठन हुआ है, तब से हर बार जिला पंचायत सदस्यों की डिमांड और उनके वोट की कीमत बढ़ती ही गई है। जिससे ऐसा लगता है कि अबकी बार कोरोना काल में जीते हुए जिला पंचायत सदस्यों की लाटरी लगने वाली है।

आपको याद होगा कि पहली बार जिला बनने के बाद जिला पंचायत के अध्यक्ष पद पर निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़ कर सुषमा पटेल ने जिला पंचायत अध्यक्ष का पद ग्रहण किया था। उस समय भी ऐसी चर्चा थी कि चुनाव में जिला पंचायत सदस्यों के हाथ कुछ खास नहीं लगने वाला था फिर 50 हजार से एक लाख तक कई सदस्य पाने में कामयाब रहे।

इसके बाद 2000 में हुए जिला पंचायत अध्यक्ष के चुनाव में यह रकम दो गुनी से भी ज्यादा हो गयी और आरक्षित सीट होने के बावजूद भी जीत पक्की कराने के लिए हर सदस्य को डेढ़ से दो लाख रुपये दिए गए थे। इस चुनाव में चंदौली जिले की जिला पंचायत अध्यक्ष की सीट पर चकिया के विधायक सत्य प्रकाश सोनकर की पत्नी पूनम सोनकर जीतने में कामयाब हुयी थीं, जो बाद में खुद चकिया की विधायक भी बनीं।

इसके बाद 2006 में हुए जिला पंचायत अध्यक्ष के चुनाव में समाजवादी पार्टी की अमलावती यादव को सपा नेता निर्विरोध चुनाव जिताने में सफल हो गए थे। इस चुनाव में भी जिला पंचायत सदस्यों का जमकर मान मनौव्वल किया गया। विरोधी खेमे के लोगों को मनाने के लिए भी मुंह मांगी रकम दी गई थी। तब जाकर निर्विरोध चुनाव संपन्न हुआ था। विरोधी कंडीडेट की पर्चा वापसी चर्चा का विषय बनी थी।

वहीं वर्ष 2010 में हुए जिला पंचायत अध्यक्ष के चुनाव में बहुजन समाज पार्टी की करीबी बनकर छत्रबली सिंह इस कुर्सी पर काबिज हो गए। ऐसी चर्चा थी कि उस चुनाव में भी जमकर खरीद-फरोख्त हुई थी और हर एक कैंडिडेट को लगभग 10-20 लाख रुपए दिए गए थे।

फिर 2016 के जिला पंचायत अध्यक्ष के चुनाव में निर्दलीय विधायक सुशील सिंह की पत्नी किरण सिंह और समाजवादी पार्टी के प्रत्याशी सरिता सिंह के बीच मुकाबला हुआ, जिसमें छत्रबली सिंह अपने चुनावी मैनेजमेंट में सुशील सिंह पर भारी साबित हुए और रामकिशुन यादव को अपने बेटे का पर्चा उठवाने के लिए मजबूर होना पड़ा। इसमें पार्टी के कई नेताओं ने भी छत्रबली सिंह के सपोर्ट में भी काम किया। जिससे सरिता सिंह समाजवादी पार्टी के सहयोग से जिला पंचायत अध्यक्ष बन गयीं।

इस चुनाव में भी उस समय की सबसे बड़ी बोली लगी थी और चर्चा थी कि यह धनराशि एक करोड़ के ऊपर गई थी। एक स्कॉर्पियो गाड़ी और नगदी के साथ साथ हर मनचाही चीज देकर सदस्यों को अपने खेमे में किया गया था। ऐसी चर्चा थी कि दो बागियों के हाथ सबसे ज्यादा रकम हाथ लगी थी। एक दो को तो 2 करोड़ देने के लिए रात में दरवाजा खटखटाया था। इतना ही नहीं हर सहयोगी सदस्यों को हर महीने एक बधी बधाई रकम भी दी जाती थी। साथ ही विभागीय कमीशन भी अपने आप मिल जाता था।

दो बार जिला पंचायत सदस्य रहे तिलकधारी बिंद का कहना है कि चंदौली जिले की जिला पंचायत कमीशन खोरी व बंदरबाट का अड्डा है। यहां पैसा लाने से लेकर खर्च होने तक कमीशन बंधा होता है। इसीलिए इस कुर्सी के लिए लोग लालायित रहते हैं और जीतने के लिए 10-20 लाख नहीं अबकी दो-तीन करोड़ भी देने को तैयार हो जाते हैं। चंदौली जिले के जिला पंचायत में 1200 से 1500 करोड़ का बजट आएगा। इसमें 30 से 40 प्रतिशत का कमीशन है। इसी हिसाब से कमायी जोड़ लीजिए। और इसीलिए सदस्य खरीदे जाते हैं। जीतने के बाद अध्यक्ष मनमाना काम करता है। सदस्यों को जो कुछ मिलता है वह इसी समय ले लेते हैं। बाकी तो अध्यक्ष की दया पर होता है। जो दे दिया वो दे दिया। आप चिल्लाते रहिए कुछ नहीं होगा।

इसी सब के चलते अब की बार भी यह चुनाव काफी महंगा होने वाला है और पिछले चुनाव के मुकाबले यह कीमत और बढ़ने की उम्मीद है। इसीलिए कई जिला पंचायत रेट खुलने का इंतजार कर रहे हैं और कुछ अपने पसंदीदा खेमे से टोकन मनी लेने लगे हैं।

जिला पंचायत सदस्यों को लगता है कि जितने अधिक दावेदार मैदान में आएंगे यहां का चुनाव उतना ही दिलचस्प होगा। यह चुनाव जितना कठिन होगा उनकी कीमत उतनी ही ज्यादा अधिक लगेगी। इसीलिए वह आजकल कह रहे हैं कि..यह दिल मांगे मोर।