चुनाव आते ही नेताओं में टिकट के लिए मारामारी बढ़ जाती है। यही नहीं सत्ता सुख भोग के लिए नेताओं को पाला बदलने में देर भी नहीं लगती। जहां सपा बसपा के गठबंधन के बाद प्रदेश में भाजपा को हराने के लिए दोनों दलों ने कमर कसी है। तो वहीं दोनो पार्टियों के नेता अपने क्षेत्रों में राजनीतिक कार्य करते हुए जन प्रतिनिधि बनने की लालसा लिए हुए अपने हिसाब से जोड़ तोड़ व कहीं से भी टिकट का पाने की हर संभव तैयारी कर रहे हैं, जिसको लेकर सपा-बसपा के नेता अंदर से परेशान भी दिख रहे हैं। चंदौली के कुछ नेता जो अब तक भाजपा व कांग्रेस को पानी पी-पीकर कोसते थे वह अपनी या अपनी पत्नी की इन दलों में सेटिंग कराना चाह रहे हैं।

सोनभद्र रावर्ट्सगंज लोकसभा सीट पर जनपद के चकिया के पूर्व विधायक व बसपा नेता जितेंद्र कुमार एडवोकेट लंबे समय से तैयारी में जुटे थे वहीं गठबंधन में यह सीट सपा के खाते में जाने के बाद भाई लाल कोल को प्रत्याशी घोषित करने के बाद उनकी आशाओं पर पानी फिर गया। राजनीतिक गलियारों में ऐसी जोरदार चर्चा है कि वह अपनी जीत के प्रति आश्वस्त दिख रहे हैं और बसपा से टिकट न मिलता देख इधर उधर भी हाथ पैर मार रहे हैं। इतना ही नहीं अपनी मजबूत दावेदारी प्रस्तुत करने के लिए लगातार लखनऊ से दिल्ली तक की परिक्रमा में जुटे हैं ।

 अगर सूत्रों की मानें तो उनके समर्थक उनको लोकसभा का दावेदार बनाने के लिए अपने अपने तरीके से अन्य पार्टियों से भी संपर्क में जुटे हैं। कोई दिल्ली में  कांग्रेस में सेटिंग करवाने का भरोसा दे रहा है तो कोई भाजपा के टिकट दिलवाने का पक्का आश्वासन दे रहा है।

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मैं बसपा का कार्यकर्ता हूं, अभी भी गठबंधन के सीटों को इधर-उधर किया जा सकता है और सोनभद्र लोकसभा सीट से सपा प्रत्याशी के नाम की घोषणा जरूर हुई है पर अभी हमारे पार्टी की सुप्रीमो बहन मायावती जी के द्वारा अधिकृत नहीं है और जब तक अधिकृत नहीं हो जाता तब तक हम अपने टिकट के लिए प्रयास में लगे रहेंगे और आगे जैसा बहन जी का निर्देश होगा उसका पालन होगा।वैसे देखा जाए तो राजनीति में हर क्षण परिवर्तन होता रहता है और मुझे विश्वास है कि बहन जी हम जैसे लोगों पर विश्वास कर जनता की अपेक्षाओं के अनुरूप प्रत्याशी बनाएंगी ।

सोनभद्र की सीट से सपा व कांग्रेस ने अपने कैंडीडेट घोषित कर दिए हैं, जबकि भाजपा के टिकट का ऐलान होना बाकी है। जिस तरह से पिछले कुछ सालों से भाजपा के मौजूदा सांसद छोटेलाल खरवार की पार्टी से ट्यूनिंग है, उसको देखकर ऐसा लगता है कि वहां सबसे ज्यादा संभावनाएं हैं। इसीलिए बसपा के पूर्व विधायक नौगढ़ व चकिया के अपने संबंधियों का इस्तेमाल गृहमंत्री राजनाथ सिंह से लेकर प्रदेश अध्यक्ष महेन्द्रनाथ पांडेय तक कर रहे हैं।

हालांकि गठबंधन होने के बाद लगभग तीन बार से सपा बसपा के संयुक्त सम्मेलन से गायब रहे इसको लेकर क्षेत्र में तरह-तरह की चर्चाएं हो रही हैं, फिर भी ऐसा माना जा रहा है कि वह अपने राजनीतिक भविष्य को सुनिश्चित करने के लिए अपने मन के हिसाब से कोई बेहतर रास्ता ही चुनेंगे। पार्टी छोड़ना या किसी अन्य दल में शामिल होना अंतिम विकल्पों में से एक होगा।